जोर से बोलो ! जय मानवता की !


भारत उत्सवों का देश है - यही बात उसे दुनिया में विशिष्ट होना बनाती है। उत्सव चाहे सांस्कृतिक हो या धार्मिक , इनमे हर वर्ग के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते रहे है। सरकारे वे चाहे किसी भी काल की हो इनकी निर्विध्न पूर्णता के लिए सहयोग करती रही है। धर्मनिरपेक्ष ' शब्द इन्ही उत्सवों , त्योहारों में चरितार्थ होता दिखाई देता रहा है। वैष्णो देवी तीर्थ जाने वाले दुर्गम मार्ग को समतल , सहज और थोड़ी थोड़ी दुरी पर लगने वाले निशुल्क भंडारों जैसे कायाकल्प को चार दशक बीत चुके है। वहां जाने वाले तीर्थ यात्री जब सुदूर प्रांतों में लौटते है तो कदम कदम पर मिलने वाले भोजन और पानी की प्रशंसा सबसे पहले करते है। यही अनुभव -अमरनाथ ' जाने वाले यात्रियों का भी रहा है।


हमारे भारतीय अवचेतन में यह बात गहराई में स्थापित हो चुकी है कि तीर्थ जाना और पैदल यात्राए करना इहलोक के साथ परलोक को भी संवार देता है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए वे लोग जो इन यात्राओं पर नहीं जा पाते , तीर्थ यात्रियों की सुविधा जुटाने में तन और धन दोनों समर्पित कर देते है - एक तरह से उनके लिए यह पुण्य कमाने जैसा होता है। यह निर्विवाद रूप से सच भी है।  पिछले कुछ वर्षों में हमने इस व्यवस्था को अपने गाँव , कस्बो और शहरों में भी आकार लेते देखा है।  कावड़ यात्रियों और सावन के सोमवार के दौरान निकलने वाली शोभा यात्राओं में भी अमरनाथ या वैष्णो देवी जैसी खान पान की सुविधाए  प्रशंसनीय होती है।


अब आते है इस लेख के मूल प्रश्न पर।
पेंतालिस पचास दिन चले लॉक डाउन ने लाखों मजदूरों के एक राज्य से दूसरे राज्य में पैदल  पलायन की तस्वीरों ने कठोर से कठोर हृदय को भी पसीजा दिया है। आरामदायक घरों में अनवरत चलने वाले टेलीविजन  इन दारुण छवियों को देश विभाजन के समय हुए विस्थापन के मौजूद  श्वेत श्याम चित्रों की स्मृतियों से एकाकार कर रहे है ! राजमार्गों पर चलने वाले इन प्रवासियों के लिए कुछ सामाजिक संगठनों या व्यक्तिगत स्तर पर मदद के समाचार सुनाई देने लगे है।  लेकिन कुछ ही के ! इन लोगों द्वारा उपलब्ध कराई गई मदद प्रवासी मजदूरों की संख्या के मान से नाकाफी है। वंचित और निराश्रित लोगों के लिए    इस तरह की गैर सरकारी मदद के प्रयास लगभग हर शहर कसबे में हो रहे है। लेकिन  क्या ही अच्छा हो कि वे सारे धार्मिक  संगठन और समाज सेवी राजमार्गो या रेलवे ट्रेक के बाजू में सफर करने वालो के लिए उसी तरह से भोजन पानी के भंडारे लगा दे जैसे तीर्थ यात्रियों के लिए करते रहे है। निसंदेह इनका धर्म और जाति स्पस्ट नहीं है लेकिन है तो ये भी उन्ही तीर्थ यात्रियों की तरह ही जो मानवता के दर्शन करने निकले है !  सरकारे अपने प्रयास कर रही है लेकिन हमारे धार्मिक संगठन उसमे अपना योगदान दे देते है तो यह अविस्मरणीय मिसाल सदियों तक मनुष्य समाज का मार्ग दर्शन करती रहेगी।
समय गुजर जाएगा लेकिन मनुष्य का मनुष्य के लिए किया गया  ' मदद धर्म ' सदैव याद रहेगा !


रजनीश जे जैन