1990 का एयरलिफ्ट और 2020 का वंदे भारत !


बहुत कम लोगों को याद होगा कि भारत पूर्व में भी विदेश में फंसे ढेड़ लाख भारतीय नागरिको को भारत ला चूका है। चूँकि उस समय सोशल मीडिया नहीं था और न ही आईटी सेल जैसी किसी प्रचार संस्था का नामो निशान था तो यह घटना भारत में उस तरह वायरल नहीं हुई जैसी आज होती है। यधपि समाचार पत्रों में इसके बारे में विस्तृत कवरेज चल रहा था। सैटेलाइट टेलीविज़न की आहट सुनाई देने लगी थी। सी एन एन का प्रसारण महानगरों में दिखाई देने लगा था और लोग उसकी चर्चा भी करते थे क्योंकि वह हर घटना लाइव दिखाया करता था। यह वह दौर था जब ईरान ईराक एक लंबे युद्ध के बाद सुस्ता रहे थे।  इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन कर्ज में गहरे घंसे अपने देश को निकालने के लिए अरब देशो से पेट्रोल उत्पादन में कमी करने की गुहार लगा रहे थे ताकि वे अपने पेट्रोलियम पदार्थों को ऊँचे दामों पर बेचकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सके। चूँकि शाही अरब परिवार सद्दाम को नापसंद करता था तो उनकी याचना पर ज्यादा गौर नहीं किया जा रहा था । इस समय भारत अरब देशों से अपने जरुरत की तेल आपूर्ति किया करता था। बावजूद इसके , सद्दाम के मन में  भारत के लिए एक सॉफ्ट कार्नर हुआ करता था। उन्होंने अपने बड़े बेटे का नाम उदय रखा था ! यह कहानी कभी और !


जब अरब और ईराक अपनी उलझन टेबल पर नहीं सुलझा पाए तो सद्दाम हुसैन ने सैंकड़ों टैंक कुवैत में प्रवेश करा दिये। कई दिनों तक इराकियों ने कुवैत के सोने को लुटा। शाही परिवार तो पहले ही दिन पलायन कर गया था।  भुगत रही थी तो  कुवैत की जनता और भारतीय कामगार उस समय जिनकी संख्या एक लाख पचास हजार से ज्यादा थी। इधर भारत में इस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह की अल्पमत सरकार सत्ता में थी जिसे भाजपा बाहर से समर्थन दे रही थी।
ऐसे नाजुक समय में किस्मत से  इंद्र कुमार गुजराल जैसे विदेश नीति के जानकार भारत के  विदेश मंत्री थे। अरब देश चाहते थे कि इस इराकी सीनाजोरी पर भारत उनके साथ खड़ा नजर आये लेकिन भारत किसी एक का पक्ष लेकर अपने फंसे ढेड़ लाख नागरिकों को इराकियों की दया पर नहीं छोड़ सकता था।
 


दुविधा के इन लम्हों में गुजराल साहब बगदाद पहुंचे और सद्दाम से मुलाक़ात की। सद्दाम ने भी उन्हें निराश नहीं किया। समस्त भारतीयों को सुरक्षा के साथ ईराक से निकल जाने की आधिकारिक अनुमति प्रदान कर दी गई। यह वह दौर था जब भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी। लेकिन वी पी सिंह ने ठान लिया था कि कैसे भी करके भारतीयों को सुरक्षित घर वापस लाना है। कई देशों में राजदूत रहे प्रेमशंकर झा की अगुआई में एक टास्क फाॅर्स बनाई गई जिसके सीधे संपर्क में प्रधानमंत्री वी पी सिंह स्वयं थे। सभी भारतीयों को बसरा या बग़दाद से लाना संभव बही था क्योंकि युद्ध लगातार जारी था। यह तय किया गया कि सभी यात्री बग़दाद से जॉर्डन की सीमा तक का बारह सौ किलोमीटर का सफर बस से तय करेंगे। वहां से उन्हें वतन वापसी की उड़ानों में सवार किया जाना था। इधर भारत सरकार ने बगैर शोर मचाये एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के सभी विमानों को दिल्ली से जॉर्डन के अम्मान के लिए लगा दिया गया। न राष्टवाद के नारे लगे न ही छदम देश प्रेम की डींग हाँकि गई। 1990 के अगस्त से लेकर अक्टूबर ( 59 दिन  ) तक चले इस अभियान में भारतीय विमानों की पांच सौ से अधिक फ्लाइट से  एक लाख पचास हजार से अधिक देश वासियों को घर वापस लाया गया। इस अभियान का सबसे उल्लेखनीय पहलु यह रहा कि किसी भी यात्री से भारत सरकार ने एक पैसा नहीं वसूला। जबकि वतन लौटने वाले अधिकांश लोग संपन्न तबके के थे।


इस लेख को पढ़ते हुए  पाठक वंदे भारत अभियान की तुलना इराकी एयरलिफ्ट अभियान से करने के लिए स्वतंत्र है ! इस कहानी की सत्यता को जांचना चाहे तो The Week के 7 मई और the wire के 11 मई के अंको को देखा जा सकता है। 


रजनीश जे जैन